
रायपुर. तारीख थी 4 मई 2016, जब आंध्र प्रदेश में पुलिस के साथ नक्सलियों का इनकाउंटर हुआ, जिसमें आजाद दो अन्य नक्सलियों के साथ मारा गया. उसके पास से बरामद लैपटॉप से एक सेल्फी मिली, जो तब के 20 लाख के इनामी चलपति उर्फ अप्पा राव और उसकी पत्नी अरुणा ( पांच लाख की इनामी) की पहचान की वजह बनी. माना जाता है कि आजाद अरुणा का भाई था. दोनों नक्सल मूवमेंट से जुड़े थे.
यही से शुरू हुई चलपति और उसकी पत्नी अरुणा के खात्मे की कहानी, क्योंकि पुलिस और सुरक्षा बलों को जिस सबूत यानी पहचान की सबसे ज्यादा जरूरत थी. वो उन्हें मिल चुकी थी, लेकिन चलपति इतना जानकार और शातिर था कि सुरक्षा बलों को उस तक पहुंचने में लगभग नौ साल लग गये, तब कहीं जाकर वो सुरक्षा बलों को हत्थे चढ़ा. तब तक चलपति पर इनाम की राशि 20 लाख से बढ़ कर एक करोड़ हो चुकी थी.

आज बात ऐसे नक्सली की, जिस पर बचे-खुचे नक्सल मूवमेंट में विचार फूंकने की जिम्मेदारी थी. जिसे ये पता था कि हमें कब ठिकाना बदलना है और कैसे सुरक्षा बलों से बचना है. नाम चलपति चलपति उर्फ अप्पा राव. जिसका जन्म आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के मटेमपल्ली गांव में हुआ था. शुरुआती पढ़ाई चलपति ने गांव से ही की. 10वीं की पढ़ाई के बाद वो नक्सल आंदोलन से जुड़ गया. पढ़े-लिखे होने का चलपति को फायदा मिला और उसे सेंट्रल जोन का सदस्य बना दिया गया.
कहा जाता है कि चलपति इसके बाद नक्सली नेता रामकृष्ण के संपर्क में आया और बाद में उनका सहायक बन गया. यहीं से उसकी किस्मत बदलती चली गयी और नक्सल मूवमेंट में वो आगे बढ़ता चला गया. चलपति जिस समय नक्सल मूवमेंट में आगे बढ़ रहा था. उसी समय तेजी से टेक्नोलॉजी भी बदल रही थी, जिसका पूरा ज्ञान उसको था. वो तकनीक की नई चीजें सीखता और उन्हें दूसरे नक्सलियों को सीखता था.
2000 में चलपति ने अरुणा नाम की नक्सली से शादी की. लगभग 16 साल ( अरुणा के मारे जाने) तक दोनों की शादी चली. दोनों नक्सल आंदोलन से जुड़ कर पति पत्नी की तरह रहे. वो जंगल में पत्तों पर सोते थे और सुबह चार बजे के आसपास अपना ठिकाना बदल लेते थे.
हालांकि बीच-बीच में दोनों के सरेंडर करने की खबरें आती रहीं, लेकिन चलपति और अरुणा ने सरेंडर नहीं किया. 2016 में जब चलपति और उसकी पत्नी अरुणा की सेल्फी सुरक्षा बलों को मिली, तो इसके तीन महीने के अंदर ही सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में अरुणा मारी गई.
ऐसा माना जाता है कि अगर सेल्फी नहीं मिलती, तो अरुणा और चलपति की पहचान सुरक्षा बलों को नहीं होती, क्योंकि इससे पहले उनके पास चलपति की 1990 के आसपास की धुंधली तस्वीर थी, जिससे उनकी पहचान करना मुश्किल था. अब छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के बार्डर पर हुई मुठभेड़ में चलपति भी मारा गया है. गरियाबंद जिले में ये मुठभेड़ हुई, जो तीन दिनों तक चली.
ऐसा माना जा रहा है कि चलपति के मारे जाने के बाद उड़ीसा और आंध्र में भी अब नक्सल आंदोलन अपनी समाप्ति की ओर पहुंच गया, क्योंकि दोनों जगह की जिम्मेदारी चलपति पर ही थी. वो इतना खूंखार था कि 2016 के बाद कई बार उसके इनकाउंटर में मारे जाने की खबर आती रही, लेकिन हर बार वो बच कर निकल जाता था. इस दौरान उस पर रखा इनाम लगातार बढ़ता जा रहा था, जो अब एक करोड़ तक पहुंच गया था, लेकिन गरियाबंद में सुरक्षा बलों ने चलपति को ढेर कर दिया.



