Mahakaleshwar Jyotiraditya: महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग
Mahakaleshwar Jyotiraditya: मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित हैं, यह भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से तीसरा ज्योतिर्लिंग है, यह एक ऐसा ज्योतिर्लिंग है, जो दक्षिणमुखी है।
शिव महापुराण के अनुसार, भगवान शिव ने दूषण नामक दैत्य का वध करने के लिए महाकाल का रूप लिया था। दूषण का वध करने के बाद भगवान शिव को कालों के काल महाकाल या महाकालेश्वर नाम से पुकारा जाने लगा।
इस मंदिर को लेकर ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव ने यहां दूषण नामक राक्षस का वध कर अपने भक्तो की रक्षा की थी। यह मंदिर स्वयंभू, भव्य और दक्षिणमुखी है. इस मंदिर में प्रतिदिन अलसुबह भस्म आरती होती है, यह संपूर्ण विश्व में एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है, जहां भगवान शिव की भस्मारती की जाती है, यह आरती सूर्योदय से पूर्व सुबह 4 बजे की जाती है।
धार्मिक नगरी उज्जैन पूरी दुनिया में काफी मशहूर है। यहां 12 ज्योतिर्लिंग में से एक महाकाल मंदिर स्थित है। इसके अलावा हर 12 साल में कुंभ मेले का भी आयोजन किया जाता है जो सिंहस्थ के नाम से जाना जाता है। इस शहर की और भी कई ऐसी बातें जिससे आप शायद आज ता अंजान हैं तो चलिए है इस शहर से जुड़ी कुछ दिलचस्प बाते-
हम सभी ने बचपन से पढ़ा है कि हमारी पृथ्वी गोलाकार है, लेकिन जब भी बात केंद्र बिंदु की आती है, तो लोग अक्सर सोच में पड़ जाते है। ऐसे में अगर हम आपसे यह कहे कि मध्य प्रदेश का शहर उज्जैन ही पृथ्वी का केंद्र बिंदु है, तो क्या आप इस पर यकीन करेंगे। दरअसल, ऐसा हम नहीं बल्कि खगोल शास्त्री मानते हैं। खगोल शास्त्रीयों के मुताबित मध्य प्रदेश का यह प्राचीन शहर धरती और आकाश के बीच में स्थित हैं। यहां तक की शास्त्रों में भी उज्जैन को देश का नाभि स्थल बताया गया है। वराह पुराण में भी उज्जैन नगरी को शरीर का नाभि स्थल और बाबा महाकालेश्वर को इसका देवता बताया गया है।
भोलेनाथ की नगरी उज्जैन हमेशा से ही काल-गणना के लिए बेहद उपयोगी एवं महत्वपूर्ण मानी जाती रही है। देश के नक्शे में यह शहर 23.9 डिग्री उत्तर अक्षांश एवं 74.75 अंश पूर्व रेखांश पर स्थित है। इतना ही नहीं खुद ऋषि-मुनि भी यह मानते आए हैं कि उज्जैन शून्य रेखांश पर स्थित है। कर्क रेखा भी इस शहर के उपर से गुजरती है। इसके अलावा उज्जैन ही वह शहर है, जहां कर्क रेखा और भूमध्य रेखा एक दूसरे को काटती है। इस प्राचीन नगरी की इन्हीं विशेषताओं को ध्यान में रख काल-गणना, पंचांग निर्माण और साधना के लिए उज्जैन को सर्वश्रेष्ट माना गया है। यही वजह है कि प्राचीन के समय से ज्योतिषाचार्य यहीं से भारत की काल गणना करते आए हैं। काल की गणना की वजह से ही यहां के अराध्य भगवान शिव को महाकाल के नाम से जाना जाता है।
यहीं वजह है कि तंत्र साधना के लिहाज से काफी अहम माना जाता है, क्योंकि तंत्र साधना के लिए दक्षिणमुखी होना जरूरी है। इस मंदिर को लेकर एक मान्यता यह भी है कि यहां भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए थे। साथ ही पुराणों में भी ऐसा कहा गया है कि उज्जैन की स्थापना खुद ब्रह्माजी ने की थी। यह भी मान्यता है कि महाकाल के दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।
उज्जैन से मिला विक्रम संवत कैलेंडर
काल गणना के अलावा उज्जैन शहर अपने राजा विक्रमादित्य की वजह से भी काफी जाना जाता है। दरअसल, प्राचीनकाल में इस नगरी में राज करने वाले राजा विक्रमादित्य ने हिंदुओं के लिए एक एतिहासिक कैलेंडर विक्रम संवत निर्माण कराया था, जो वर्तमान में एक प्रचलित हिन्दु पंचाग है। इसी पंचाग के आधार पर भारत के उत्तरी, पश्चिमी और मध्य भाग में व्रत-त्योहार मनाए जाते हैं। इतना ही नहीं इस संवत को नेपाल में भी मान्यता मिली हुई हैं। विक्रम संवत पहले देश में युधिष्ठिर संवत, कलयुग संवत और सप्तर्षि संवत भी प्रचलित रह चुके हैं।
उज्जैन के कुंभ को क्यों कहते हैं सिंहस्थ
हिन्दू धर्म में उज्जैन शहर का अपना अलग महत्व है। यह प्राचीन धार्मिक नगरी देश के 51 शक्तिपीठों और चार कुंभ स्थलों में से एक हैं। यहां हर साल में पूर्ण कुंभ तथा हर 6 साल में अर्द्धकुंभ मेला लगता है। हालांकि, उज्जैन में होने वाले कुंभ मेले को सिंहस्थ कहा जाता है। दरअसल सिंहस्थ का संबंध सिंह राशि से है। जब सिंह राशि में बृहस्पति और मेष में सूर्य का प्रवेश होता है, तो उज्जैन में कुंभ का आयोजन होता है, जिसे सिंहस्थ के नाम से जाना जाता है।
इन नामों से भी जाना जाता है उज्जैन
शिप्रा नदी के तट पर बसे होने की वजह से शहर को शिप्रा के नाम से भी जाना जाता है। इसके अलावा यह प्राचीन नगरी संस्कृत के महान कवि कालिदास की नगरी के नाम से भी काफी प्रचलित है। वहीं, बात करें इसके प्राचीन नामों की तो उज्जैन को पहले अवन्तिका उज्जयनी कनकश्रन्गा के नाम से भी जाना जाता था। यह मध्य प्रदेश के पांचवे सबसे बड़े शहरों में से है, जो अपनी धार्मिक मान्यतायों के चलते दुनियाभर में पर्यटन का प्रमुख स्थल है। महाकालेश्वर मंदिर के अलावा यहां गणेश मंदिर हरसिद्धी मंदिर, गोपाल मंदिर, मंगलनाथ मंदिर, काल भैरव मंदिर भी काफी प्रसिद्ध है।



