Mangal Chandrika Mata Shakti Peeth: मंगल चंद्रिका माता शक्तिपीठ, वर्धमान, बंगाल
Mangal Chandrika Mata Shakti Peeth: सनातन धर्म में दुर्गा मां के कई रूपों की पूजा की जाती है, दुर्गा मां ने समय समय पर अवतार लेकर भक्तों को संकटों से बचाया है, देश भर में मां भगवती के 51 शक्तिपीठ हैं और यहां मां के शक्तिरूपों की अराधना की जाती है, इन्ही शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ है पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले में उज्जयनी का मंगल चंडिका शक्तिपीठ, यहां मां भगवती के शक्ति स्वरूप मंगल चंडिका की पूजा की जाती है, पिता दक्ष के घर में अपमानित होकर जब सती यज्ञ कुंड में कुद गईं तो सती के मृत शरीर को लेकर शिव तांडव करने लगे, तब भगवान विष्णु ने उनका क्रोध शांत करने के लिए सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिए थे, ये टुकड़े धरती पर जहां गिरे, वहां देवी के शक्तिपीठ स्थापित हो गए।
वर्धमान जिले के कोग्राम गांव में उज्जयनी नामक जगह पर सती की दाईं कलाई गिरी थी, दाईं कलाई गिरने पर ये स्थान शक्तिपीठ कहलाया इसका नाम रखा गया मंगल चंडिका शक्तिपीठ।
नाम का अर्थ : मंगल चंडिका शक्तिपीठ का नाम मां दुर्गा के ही एक नाम पर रखा गया है, मंगल चंडिका का अर्थ है मंगल करने वाली यंडी रूपी आदि शक्ति, मां जब भक्तों की रक्षा करने के लिए राक्षसों का वध करती है तो वो उग्र यानी चंडी अवतार में आती है और इसी अवतार को चंडिका कहा गया है। इसका पूरा अर्थ हुआ भक्तों का मंगल करने के लिए चंडिका बनी देवी, देवी दुर्गा ने जब जब राक्षसों का वध करने के लिए अवतार लिए वो सब चंडी देवी के नाम से मशहूर हुए है।
इस शक्तिपीठ में मां सती को मंगल चंडिका और भौरव को मांगल्य कपिलांबर कहा जाता है। यहां एक कुंड में सती की दाहिनी कलाई गिरी और उस कुंड के उपर ही मंगल चंडिका की मूर्ति स्थापित की गई है। देवी के साथ भैरव के रूप में स्वयं भगवान शिव मौजूद हैं जिन्हें यहां कपिलांबर का नाम दिया गया है, इस बात की पुष्टि इस स्त्रोत में होती है।
उज्जयिन्यां कूर्परं व मांगल्य कपिलाम्बरः
भैरवः सिद्धिदः साक्षात् देवी मंगल चण्डिका।।
मंगल चंडिका शक्तिपीठ के त्योहार– मंगल चंडिका शक्तिपीठ में मार्च के महीने में महाशिवरात्रि बहुत ही धूमधाम से मनाई जाती है. इसके अलावा दुर्गा पूजा का महोत्सव भी यहां बड़े पैमाने पर आयोजित किया जाता है. यहां नौ दिन तक चलने वाले दुर्गा पूजा महोत्सव में दूर दूर से लोग मां के दर्शन और पूजा करने के लिए आते हैं.
इस दौरान यहां कई कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं. इसके अलावा नवंबर माह में दीपावली के दिन यहां विशेष तौर पर होने वाली कालीपूजा भी बहुत प्रसिद्ध है. रात के वक्त होने वाली कालीपूजा में मां मंगल चंडिका का विशेष श्रृंगार किया जाता है.
मंगल चंडिका शक्तिपीठ का इतिहास- मंगल चंडिका शक्तिपीठ का इतिहास ज्ञात नहीं है. मंदिर का निर्माण करीब 1000 साल पुराना बताया जाता है. समय समय पर इसकी मरम्मत और जीर्णोद्धार का काम किया गया है. हाल ही में यहां पीले रंग से मंदिर का पेंट किया गया है और उस पर लाल रंग का बॉर्डर मंदिर को मनमोहक रूप प्रदान करता है. मंदिर कोग्राम नामक गांव के बीच बसा हुआ है और स्थानीय पुजारी इसकी देख रेख करते हैं.
मंगल चंडिका शक्तिपीठ की संरचना– मंगल चंडिका शक्तिपीठ एक बेहद सामान्य मंदिर के रूप में स्थापित है. इसमें ना तो कई मंजिला मंदिर है और ना ही किसी तरह की विशेष वास्तुकला या नक्काशी. मंदिर हल्के पीले रंग से पेंट है और एक विशाल प्रवेश द्वार से अंदर जाया जाता है. अंदर एक बाग है जिससे होकर आप मंदिर परिसर में दाखिल होते हैं.
गर्भगृह में मां मंगल चंडिका की काले चमकीले पत्थर से बनी एक मनमोहक मूर्ति स्थापित है जो एक चांदी के सिंहासन पर विराजमान हैं. चांदी का ये सिंहासन एक डोली की तरह लगता है, जिसमें ऊपर की तरफ कई फूल पत्तियों की सुंदर कलाकारी दिखती है.
चांदी का सिंहासन संगमरमगर के एक बड़े से प्लेटफॉर्म पर रखा गया है जिसे माता की चौकी भी कहते हैं और मान्यता के अनुसार इसके नीचे ही वो जगह है जहां सती की कलाई कटकर गिरी थी. मूर्ति के सीधे हाथ की तरफ एक त्रिशूल स्थापित है. इसके पास ही संगमरमर के ऊंचे प्लेटफॉर्म पर भैरव कपिलांबर का विग्रह स्थापित हैं.
मंदिर के शिखर पर एक त्रिशूल स्थापित है. मुख्य प्रवेश द्वार के सीधे हाथ पर एक अन्य प्रवेश द्वार है जो हॉल की तरफ जाता है. गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर दो बड़े पिलर स्थापित हैं. गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर एक लोहे का बड़ा जाल वाला दरवाजा है जो भक्तों के लिए खोला जाता है. आप गर्भगृह के बाहर खड़े होकर अंदर की आरती को आराम से देख सकते हैं. मंदिर के पीछे एक नदी बह रही है और आस पास पेड़ों एवं हरियाली के अलावा कुछ नहीं दिखता.
मंदिर परिसर में कई बाग बगीचे हैं जो हरियाली की कहानी कहते हैं. यानी कुल मिलाकर यहां आपको काफी शांत और सौम्य वातावरण देखने को मिलेगा. इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है कि यहां का प्राकृतिक सौंदर्य देखते ही बनता है.
नारियल के पेड़ों की छाव में ये पूरा इलाका आता है. आस पास प्राकृतिक सौंदर्य से भरी हरियाली बरसों से इस शक्तिपीठ को नैसर्गिक सुंदरता प्रदान कर रही है. यहां का शांत वातावरण आपको आध्यात्म की तरफ ले जाता है. यहां केवल दुर्गा पूजा और शिवरात्रि के दौरान भीड़ रहती है.
मंदिर में दर्शन का समय और नियम:- मंगल चंडिका शक्तिपीठ का मंदिर सुबह 6 बजे दर्शन के लिए खुल जाता है और रात को 8 बजे मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं. यहां दर्शन करने के लिए कोई लिखित ड्रेसकोड नहीं है. महिलाएं साड़ी सूट और पुरुष धोती या पैंट किसी भी पहनावे में मंदिर जा सकते हैं.



