Mata Lalita Devi Shakti Peeth: माता ललिता देवी शक्तिपीठ, प्रयागराज
Mata Lalita Devi Shakti Peeth: नवरात्र के पांचवें दिन मां के ललिता देवी स्वरूप की पूजा होती है। देवी पुराण के अनुसार, सती का हस्तांगुल यानी हाथ की उंगली जहां गिरी, वहीं मां ललिता देवी प्रकट हुईं। यह जगह 51 शक्तिपीठों में से एक है। त्रिपुर सुंदरी के नाम से विख्यात मां ललिता देवी का मंदिर प्रयागराज के मीरापुर मोहल्ले में है।
मान्यता:-
इस मंदिर का विशेष महात्म्य है। मान्यता है कि मां का यह मंदिर पौराणिक काल से स्थित है। मान्यता है कि पवित्र संगम में स्नान के पश्चात इस महाशक्तिपीठ में दर्शन-पूजन से भक्तों की मनोकामना पूरी होती है। ललिता देवी के दिव्य स्वरूप का दर्शन- पूजन करने के लिए देशभर से श्रद्धालु आते हैं।
पुराणों में मिलता है उल्लेख
दुर्गासप्तशती में हृदय ललिता देवी कहा गया है, अर्थात् मां ललिता प्रत्येक प्राणी के हृदय में वास करती है पौराणिक कथा के अनुसार सती जब अपने पिता प्रजापति दक्ष द्वारा दामाद भगवान शिव का अपमान न सह सकीं तो उन्होने नाराज होकर यज्ञ कुंड में आत्मदाह कर लिया था। जब यह बात भगवान शिव को पता चली तो वह उनके शव को लेकर क्रोध में विचरण करने लगे। माता सती से भगवान शिव के मोह को दूर करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को काट दिया। चक्र से कटकर अलग होने पर जिन 51 स्थान पर सती के अंग गिरे, वह पावन स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। प्रयाग में सती की हस्तागुलिका गिरने के कारण राजराजेश्वरी, शिवप्रिया, त्रिपुर सुंदरी मां ललिता का प्रादुभाव भय-भैरव के साथ हुआ। यहां माता महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के स्वरूप में विराजित हैं।
108 फीट ऊंचा है माता का मंदिर
जिस स्थान पर कभी माता की अंगुलियां गिरी थीं, वहां पर आज एक 108 फीट ऊंचा गुंबदनुमा एक विशाल मंदिर है। प्रयागराज शहर के मध्य में यमुना नदी के किनारे मीरापुर स्थित यह मंदिर श्रीयंत्र पर आधारित है। माता के इस पावन शक्तिपीठ पर वैसे तो पूरे साल भक्तों का तांता लगा रहता है लेकिन नवरात्रि के अवसर पर यहां पर विशेष साधना-अराधना के लिए भक्त दूर-दूर से पहुंचते हैं। नवरात्री के नौ दिनों में माता का प्रतिदिन दिव्य श्रंगार होता है।
मंदिर परिसर में एक प्राचीन पीपल का पेड़ है, जिसके तने में धागा बांधकर भक्तगण माता से अपनी मुराद पूरी होने के लिए प्रार्थना करते हैं। साथ ही यहां पर भगवान श्री राम, लक्ष्मण सीता एवं राधा-कृष्ण के साथ श्री हनुमान जी की भव्य मूर्ति स्थापित है।
महाभारत काल से जुड़ा है मंदिर का इतिहास
मां ललिता की महिमा सदियों से बखानी जा रहीं है। किवदंति है कि महाभारत काल में लाक्षागृह अग्निकांड से सकुशल बाहर निकलने पर पांडवों ने मां ललिता का दर्शन-पूजन करने आए थे। तपस्वी संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी ने 1950 के आस-पास मंदिर का जीर्णोद्धार कराकर भव्य स्वरूप दिया। पिछले कुछ वर्षों में मंदिर को नया स्वरूप दिया गया।



