Homeराष्ट्रीयMata Savitri Shakti Peeth: माता सावित्री शक्तिपीठ कुरुक्षेत्र, हरियाणा

Mata Savitri Shakti Peeth: माता सावित्री शक्तिपीठ कुरुक्षेत्र, हरियाणा

Mata Savitri Shakti Peeth: माता सावित्री शक्तिपीठ कुरुक्षेत्र, हरियाणा

Mata Savitri Shakti Peeth: देवी भागवत पुराण में 108, कालिकापुराण में 26, शिवचरित्र में 51, दुर्गा शप्तसती और तंत्रचूड़ामणि में शक्ति पीठों की संख्या 52 बताई गई है। साधारनत: 51 शक्ति पीठ माने जाते हैं। तंत्रचूड़ामणि में लगभग 52 शक्तिपीठों के बारे में बताया गया है। प्रस्तुत है माता सती के शक्तिपीठों में इस बार सावित्री देवीकूप भद्रकाली पीठ कुरुक्षेत्र हरियाणा शक्तिपीठ के बारे में जानकारी।
कैसे बने ये शक्तिपीठ :-
जब महादेव शिवजी की पत्नी सती अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ में अपने पति का अपमान सहन नहीं कर पाई तो उसी यज्ञ में कूदकर भस्म हो गई। शिवजी जो जब यह पता चला तो उन्होंने अपने गण वीरभद्र को भेजकर यज्ञ स्थल को उजाड़ दिया और राजा दक्ष का सिर काट दिया। बाद में शिवजी अपनी पत्नी सती की जली हुई लाश लेकर विलाप करते हुए सभी ओर घूमते रहे। जहां जहां माता के अंग और आभूषण गिरे वहां—हां शक्तिपीठ निर्मित हो गए। हालांकि पौराणिक आख्यायिका के अनुसार देवी देह के अंगों से इनकी उत्पति हुई, जो भगवान विष्णु के चक्र से विच्छिन्न होकर 108 स्थलों पर गिरे थे, जिनमें में 51 का खास महत्व है।
सावित्री पीठ कुरुक्षेत्र शक्तिपीठ :-
हरियाणा के कुरुक्षेत्र में माता की एड़ी (गुल्फा) गिरी थी। इसकी शक्ति है सावित्री और भैरव है स्थाणु। देविकूप भद्रकाली मंदिर को सावित्री पीठ, देवी पीठ कालिका पीठ या आदी पीठ भी कहा जाता है। कुरुक्षेत्र में महाभारत युद्ध के पहले श्रीकृष्ण के कहने पर अर्जुन ने यहां माता की अराधना की थी।
इसी पीठ में भद्रकाली विराजमान है और गणों के रुप में दक्षिणमुखी हनुमान, गणेश तथा भैरव विद्यामान हैं। यही स्थाणु शिव का अद्भुत शिवलिंग भी है, जिसमें प्राकृतिक रूप से ललाट, तिलक एवं सर्प अंकित हैं। यह शक्तिपीठ हरियाणा के कुरुक्षेत्र जंक्शन तथा थानेश्वर रेलवे स्टेशन को दोनों ओर से 4 किलोमीटर दूर झांसी मार्ग पर, द्वैपायन सरोवर के पास स्थित है।
कुरुक्षेत्र :-
51 शक्तिपीठ देश में हैं। इनमें एक धर्मनगरी कुरुक्षेत्र है। यह प्रदेश का एकमात्र शक्तिपीठ है। इनका नाम श्रीदेवी कूप भद्रकाली मंदिर है। भद्रकाली शक्तिपीठ में देवी सती का दाए पैर का टखना (घुटने के नाचे का भाग) गिरा था। भद्रकाली शक्तिपीठ में श्रीकृष्ण और बलराम का मुंडन हुआ था। इससे इसका महत्व बढ़ गया। महाभारत युद्ध में विजय का आशिर्वाद लेने पांडव श्रीकृष्ण के साथ यहां आए थे। पांडवों ने मंदिर में आकर घोड़े दान किए थे। तब से घोड़े दान करने की प्रथा चली आ रही है।

- Advertisement -spot_img
Stay Connected
16,985FansLike
2,458FollowersFollow
61,453SubscribersSubscribe
Must Read
- Advertisement -spot_img
Related News
- Advertisement -spot_img

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here