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BHIMASHANKAR JYOTIRLINGA: महादेव ने जिस स्थान पर भीमा का वध किया, वहीं पर भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग

BHIMASHANKAR JYOTIRLINGA: भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग

BHIMASHANKAR JYOTIRLINGA:भीमाशंकर मंदिर नागर शैली की वास्तुकला से बनी एक प्राचीन और नई संरचनाओं का समिश्रण है।

महादेव ने जिस स्थान पर भीमा का वध किया वह स्थान देवतओं के लिए पूज्यनीय बन गया। सभी ने भगवान शिव के उसी स्थान पर शिवलिंग रूप में प्रकट होने की प्रार्थना की।–भगवान शंकर ने देवताओं की यह अर्जी भी मान ली और उसी स्थान पर शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए। तभी से इस स्थान को भीमाशंकर के नाम से जाना जाता है।

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग नाम क्यों पड़ा?

भीम और शिव जी के बीच भंयकर युद्ध हुआ और उसमें महादेव की हुंकार से भीमा का विनाश हो गया, इसके बाद सभी देवताओं ने महादेव से इसी स्थान पर शिवलिंग रूप में निवास करने को कहा, तब से ही यहां शिव को भीमाशंकर के नाम से पूजा जाता है।

भीमाशंकर में क्या खास है?

यहां के भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर महादेव के नाम से जानते हैं। ऐसा कहा जाता है कि शिव जी ने यहीं किया था कुम्भकर्ण के बेटे का वध, तभी से यहां पर ये मंदिर स्थापित है। यहां पर भगवान शिव ने भीमासुर राक्षस का वध किया था। नासिक से यह स्थान 180 किलोमीटर पड़ता है।

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के पास कौन सी नदी है?

यग्म 3 सुमेलित है: भीमाशंकर मंदिर पुणे, महाराष्ट्र के सह्याद्री क्षेत्र में स्थित है। यह भीमा नदी के तट पर स्थित है और इस नदी का स्त्रोत माना जाता है।

18वीं शताब्दी में नाना फड़नवीस ने सभामंडप का निर्माण कराया, उन्होने शिखर का डिजाइन और निर्माण भी किया। मराठा राजा छत्रपति शिवाजी महाराज ने धार्मिक समारोहों को सुविधाजनक बनाने के लिए इस मंदिर का निर्माण कराया था।

शिवलिंग और ज्योतिर्लिंग में क्या अंतर है?

शिवलिंग मानव द्वारा स्थापित किए गए हैं। इनमें से कुछ शिवलिंग मानव द्वारा निर्मित हैं तो कुछ स्वयंभू हैं और फिर उनको मंदिरों में स्थापित किया जाता है। ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के स्वयंभू का अवतार है। ज्योतिर्लिंग का अर्थ है भगवान शिव का ज्योति के रूप में प्रकट होना। ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के अद्वितीय प्रतिनिधित्व हैं। ज्योति का अर्थ है प्रकाश और लिंग का अर्थ है चिह्न, एक संकेत। ज्योतिर्लिंग का अर्थ है, भगवान शिव का दीप्तिमान चिह्व।

वैसे तो ज्योतिर्लिंग की उत्पति को लेकर कई मान्यताएं है, लेकिन शिवपुराण के अनुसार उस समय आकाश से ज्योति पिंड पृथ्वी पर गिरे और उनसे पूरी पृथ्वी पर प्रकाश फैल गया था। और इन्ही 12 पिंडों को 12 ज्योतिर्लिंग का नाम दे दिया गया है।

भीमाशंकर मंदिर तक पहुचने के लिए आपको लगभग 230 सीढ़ीयां चढ़नी पड़ती है, और खड़ी नहीं हैं। डोली की सुविधा भी उपलब्ध थी, बांस से बंधी एक बुनियादी लोहे की कुर्सी, जिसे चार लोग ले जाते थे।

शिव के पसीने से निकलती है नदी, कैसे हुई भीमाशंकर की स्थापना

शिव और कुंभकर्ण के बेटे भीमा से भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग का गहरा संबंध है। 12 ज्योतिर्लिंग में छठा स्थान भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग का आता है, महाराष्ट्र से थोड़ी दूर सहाद्रि नामक पर्वत स्थिति भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग का संबध रावण के भाई कुंभकर्ण के बेटे से है।

शिव पुराण में उल्लेख मिलता है कि भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग में सूर्योदय के बाद जो भी सच्चे मन से भगवान शिव की पूजा अर्चना करता है उसे उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है.

भीमाशंकर में शंकर जी के पसीने निकली नदी

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है, यहां शिवलिंग का आकार काफी मोटा है इसलिए मोटेश्वर महादेव कहा जाता है, इस मंदिर के समीप एक नदी बहती है, यह नदी आगे जाकर कृष्णा में मिलती है।
शिव पुराण के अनुसार यहां राक्षस भीमा और भगवान शंकर के बीच भंयकर युद्ध हुआ था, इसमें शिव के शरीर से निकले पसीने की बूंद से ही भीमारथी नदी का निर्माण हुआ है।

भीमाशंकर से है कुंभकरण के बेटे का संबंध

त्रेतायुग में रावण के भाई कुंभकर्ण का एक पुत्र था भीमा. भीमा का जन्म कुंभकर्ण की मृत्यु के बाद हुआ, जब उसे ज्ञात हुआ कि उसके पिता का वध भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम ने किया है, तो वह क्रोधित हुआ, भगवान विष्णु से बदला लेने के लिए ब्रह्मा को तप कर प्रसन्न कर लिया। ब्रह्मा जी के वरदान से भीमा बहुत शक्तिशाली हो गया और देवलोक पर अपना राज्य स्थापित कर लिया।

शिव ने किया भीमा का विनाश

संसार को इस राक्षस से बचाने के लिए राजा कामरूप शिव जी की भक्ति करने लगे, भीमा को जब ये पता चला तो उसने राजा को कारागार में डाल दिया. राजा वहां भी शिवलिंग बनाकर पूजा करने लगा, क्रोध में आकर भीमा ने जैसे ही तलवार से शिवलिंग को तोड़ने का प्रयास किया, स्वयं शिव जी प्रकट हो गए, भीम और शिव जी के बीच भंयकर युद्ध हुआ और उसमें महादेव की हुंकार से भीमा का विनाश हो गया, इसके बाद सभी देवताओं ने महादेव से इसी स्थान पर शिवलिंग रूप में निवास करने को कहा, तब से ही यहां शिव को भीमाशंकर के नाम से पूजा जाता है।

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